Devasthan Department, Rajasthan
 

पठनीय सामग्री

 

हिंदू परंपरा के अनुसार कुछ प्रमुख तीर्थों-धामोंकी श्रेणियाँएवं सूची

वेद

वेद 'वेद' शब्द संस्कृत भाषा के विद् शब्द से बना है, जिसका अर्थ 'ज्ञान' है। वेद विश्व के सर्वाधिक प्राचीन लिखित धार्मिक दार्शनिक ग्रंथ हैं।
इनकी संख्या 4 है-

ऋग्वेद
यजुर्वेद
सामवेद
अथर्ववेद

वेदों को त्रयी भी कहा जाता है. यह विभाजन गद्य-पद्य और गायन के आधार पर किया गया है-

वेद का पद्य भाग -  ऋग्वेद
वेद का गद्य भाग -  यजुर्वेद
वेद का गायन भाग -  सामवेद

'चतुर्वेद' के मंत्रों व प्रतिपाद्य विषयों का विवरण इस प्रकार है -

क्र सं

वेद

मंत्र संख्या

शैली

विवरण

1

ऋग्वेद

१० हजार मंत्र

मन्त्रपरक

सबसे प्राचीन वेद

2

यजुर्वेद

३७५० मंत्र

गद्यात्मक

कर्मकांडपरक, शुक्ल एवं कृष्ण भाग में विभाजित

3

सामवेद

१९७५ मंत्र

गेयात्मक

संगीतमय, अधिकांश मंत्र ऋग्वेद से ही

4

अथर्ववेद-

७२६० मंत्र

प्रौद्योगिकी, आरोग्य एवं तंत्रपरक

सबसे नवीन वेद

वैदिक वाङ्मय का मुख्यतः 4 रूपों में विभाजन किया जाता है। ये चार भाग निम्नानुसार हैं -

संहिता (मन्त्र) भाग -  यज्ञानुष्ठान मे प्रयुक्त व विनियुक्त भाग.
ब्राह्मण -ग्रन्थ  -   वेद के यज्ञानुष्ठान के कर्मकाण्ड की विवेचना.
आरण्यक – यज्ञानुष्ठान के कर्मकाण्ड के पीछे आध्यात्मपरक उद्देश्य की विवेचना.
उपनिषद -   वेद के अंतर्गत परम तत्व (ब्रह्म माया, अविद्या, जीवात्मा और जगत् के स्वभाव और सम्बन्ध) का दार्शनिक और ज्ञानपूर्वक वर्णनवाला भाग. 

संहिता भाग

संहिता भाग को ही मूल वेद कहा जाता है। वेदों की भी ऋषियों की परंपरा के अनुसार अनेक शाखाएं हैं, जो मूलतः उनकी संहिताओं से जुड़ी हैं । यज्ञ करने में साधारणतया मन्त्रोच्चारण की शैली, मन्त्राक्षर एवं कर्म-विधि में विविधता रही है । इस विविधता के कारण भी वेदों की शाखाओं का विस्तार हुआ है । यथा-ऋग्वेद की २१ शाखा, यजुर्वेद की १०१ शाखा, सामवेद की १००० शाखा और अथर्ववेद की ९ शाखा- इस प्रकार कुल १,१३१ शाखाएँ हैं । इस संख्या का उल्लेख महर्षि पतञ्जलि ने अपने महाभाष्य में भी किया है । उपर्युक्त १,१३१ शाखाओं में से वर्तमान में केवल १२ शाखाएँ ही मूल ग्रन्थों में उपलब्ध हैः-

ऋग्वेद की २१ शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ही ग्रन्थ प्राप्त हैं- शाकल-शाखा और शांखायन शाखा ।

यजुर्वेद में कृष्णयजुर्वेद की ८६ शाखाओं में से केवल ४ शाखाओं के ग्रन्थ ही प्राप्त है- तैत्तिरीय-शाखा, मैत्रायणीय शाखा, कठ-शाखा और कपिष्ठल-शाखा

शुक्लयजुर्वेद की १५ शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ग्रन्थ ही प्राप्त है- माध्यन्दिनीय-शाखा और काण्व-शाखा ।

सामवेद की १,००० शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ही ग्रन्थ प्राप्त है- कौथुम-शाखा और जैमिनीय-शाखा।

अथर्ववेद की ९ शाखाओं में से केवल २ शाखाओं के ही ग्रन्थ प्राप्त हैं- शौनक-शाखा और पैप्पलाद-शाखा।

उपर्युक्त १२ शाखाओं में से केवल ६ शाखाओं की अध्ययन-शैली प्राप्त है- शाकल, तैत्तरीय, माध्यन्दिनी, काण्व, कौथुम तथा शौनक शाखा । यह कहना भी अनुपयुक्त नहीं होगा कि अन्य शाखाओं के कुछ और भी ग्रन्थ उपलब्ध हैं, किन्तु उनसे शाखा का पूरा परिचय नहीं मिल सकता एवं बहुत-सी शाखाओं के तो नाम भी उपलब्ध नहीं हैं ।

ब्राह्मण ग्रन्थ -

ब्राह्मण ग्रन्थ  वेदों का गद्यपरक व्याख्या और मुख्यतः यज्ञ व कर्मकांडप्रधान खण्ड है।  ब्राह्मण ग्रन्थ वैदिक वांग्मय का वरीयताके क्रम मे दूसरा हिस्सा है जिसमें गद्य रूप में देवताओं की तथा यज्ञ की रहस्यमय व्याख्या की गयी है और मन्त्रों पर भाष्य भी दिया गया है। इनकी भाषा वैदिक संस्कृत है। हर वेद का एक या एक से अधिक  ब्राह्मण ग्रन्थ है (हर वेद की अपनी अलग अलग शाखा है) आज विभिन्न वेद सम्बद्ध ये ही ब्राह्मण उपलब्ध हैं :-

ऋग्वेद :

ऐतरेय ब्राह्मण -(शैशिरीय शाकल शाखा )
कौषीतकि -(या शांखायन)  ब्राह्मण (बाष्कल शाखा)

सामवेद :

प्रौढ (या पंचविंश)  ब्राह्मण
षडविंश ब्राह्मण
आर्षेय ब्राह्मण
मन्त्र (या छांदोग्य )  ब्राह्मण
जैमिनीय (या तवलकार )  ब्राह्मण

यजुर्वेद

शुक्ल यजुर्वेद :

शतपथ ब्राह्मण -(माध्यन्दिनीय वाजसनेयि शाखा)
शतपथ ब्राह्मण -(काण्व वाजसनेयि शाखा)

कृष्ण यजुर्वेद :

तैत्तिरीय ब्राह्मण
मैत्रायणी ब्राह्मण
कठ ब्राह्मण
कपिष्ठल ब्राह्मण

अथर्ववेद :

गोपथ ब्राह्मण (पिप्पलाद शाखा)

आरण्यक

आरण्यकों की स्थिति ब्राह्मण एवं उपनिषदों के बीच की होने के कारण इनके भीतर कर्मकांड और दर्शन दोनों का मिश्रण है. हर वेद का एक या अधिक आरण्यक होता है। अथर्ववेद का कोई आरण्यक उपलब्ध नहीं है। आरण्यकों का वेदानुसार परिचय इस प्रकार है -

ऋग्वेद

ऐतरेय आरण्यक
कौषीतकि आरण्यक या शांखायन आरण्यक

सामवेद
तवलकार (या जैमिनीयोपनिषद्) आरण्यक
छान्दोग्य आरण्यक

यजुर्वेद

शुक्ल

वृहदारण्यक

कृष्ण

तैत्तिरीय आरण्यक
मैत्रायणी आरण्यक

अथर्ववेद

( कोई उपलब्ध नहीं )

यद्यपि अथर्ववेद का पृथक् से कोई आरण्यक प्राप्त नहीं होता है, तथापि उसके गोपथ  ब्राह्मण में आरण्यकों के अनुरूप बहुत सी सामग्री मिलती है ।

उपनिषद्

उपनिषद् वेदों के दार्शनिक विवेचन करने वाले ग्रंथ है . वेदों का अंतिम भाग होने कारण में वेदांत भी कहा जाता है ।

मुक्तिकोपनिषद में उल्लिखित सूची को मानते हुए सामान्य परंपरा के अनुसार इनकी संख्या 108 मानी जाती है, किंतु कालांतर में अन्यान्य उपनिषद् भी बनते और जुड़ते गए । अब तक ज्ञात उपनिषदो की संख्या 220 हैः-

कुल ज्ञात उपनिषद्

१-ईशावास्योपनिषद् (शुक्लयजर्वेदीय)
२-अक्षिमालिकौपनिषद् (ऋग्वेदीय)
३-अथर्वशिखोपनिषद् (सामवेद)
४-अथर्वशिर उपनिषद् (सामवेद)
५-अद्वयतारकोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
६-अद्वैतोपनिषद्
७-अद्वैतभावनोपनिषद्
८-अध्यात्मोपनिषद् (शुक्लयजर्वेदीय)
९-अनुभवसारोपनिषद्
१०-अन्नपुर्णोंपनिषद् (सामवेद)
११-अमनस्कोपनिषद्
१२-अमृतनादोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१३-अमृतबिन्दूपनिषद् (ब्रह्मबिन्दूपनिषद्) (कृष्णयजुर्वेदीय)
१४-अरुणोपनिषद्
१५अल्लोपनिषद
१६-अवधूतोपनिषद् (वाक्यात्मक एवं पद्यात्मक) (कृष्णयजुर्वेदीय)
१७-अवधूतोपनिषद् (पद्यात्मक)
१८-अव्यक्तोपनिषद् (सामवेद)
१९-आचमनोपनिषद्
२०-आत्मपूजोपनिषद्
२१-आत्मप्रबोधनोपनिषद् (आत्मबोधोपनिषद्) (ऋग्वेदीय)
२२-आत्मोपनिषद् (वाक्यात्मक) (सामवेद)
२३-आत्मोपनिषद् (पद्यात्मक)
२४-आथर्वणद्वितीयोपनिषद्
२५-आयुर्वेदोपनिषद्
२६-आरुणिकोपनिषद् (आरुणेय्युपनिषद्) (सामवेद)
२७-आर्षेयोपनिषद्
२८-आश्रमोपनिषद्
२९-इतिहासोपनिषद् (वाक्यात्मक एवं पद्यात्मक)
३०-ईसावास्योपनिषद
उपनषत्स्तुति (शिव रहस्यान्तर्गत, अभी तक अनुपलब्ध है।)
३१-ऊध्वर्पण्ड्रोपनिषद् (वाक्यात्मक एवं पद्यात्मक)
३२-एकाक्षरोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
३३-ऐतेरेयोपनिषद् (अध्यायात्मक) (ऋग्वेदीय)
३४-ऐतेरेयोपनिषद् (खन्ड़ात्मक)
३५-ऐतेरेयोपनिषद् (अध्यायात्मक)
३६-कठरुद्रोपनिषद् (कण्ठोपनिषद्) (कृष्णयजुर्वेदीय)
३७-कठोपनिषद्
३८-कठश्रुत्युपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
३९-कलिसन्तरणोपनिषद् (हरिनामोपनिषद्) (कृष्णयजुर्वेदीय)
४०-कात्यायनोपनिषद्
४१-कामराजकीलितोद्धारोपनिषद्
४२-कालाग्निरुद्रोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
४३-कालिकोपनिषद्
४४-कालिमेधादीक्षितोपनिषद्
४५-कुण्डिकोपनिषद् (सामवेद)
४६-कृष्णोपनिषद् (सामवेद)
४७-केनोपनिषद् (सामवेद)
४८-कैवल्योपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
४९-कौलोपनिषद्
५०-कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् (ऋग्वेदीय)
५१-क्षुरिकोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
५२-गणपत्यथर्वशीर्षोपनिषद् (सामवेद)
५३-गणेशपूर्वतापिन्युपनिषद् (वरदपूर्वतापिन्युपनिषद्)
५४-गणेशोत्तरतापिन्युपनिषद् (वरदोत्तरतापिन्युपनिषद्)
५५-गर्भोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
५६-गान्धर्वोपनिषद्
५७-गायत्र्युपनिषद्
५८-गायत्रीरहस्योपनिषद्
५९-गारुड़ोपनिषद् (वाक्यात्मक एवं मन्त्रात्मक) (सामवेद)
६०-गुह्यकाल्युपनिषद्
६१-गुह्यषोढ़ान्यासोपनिषद्
६२-गोपालपूर्वतापिन्युपनिषद् (सामवेद)
६३-गोपालोत्तरतापिन्युपनिषद्
६४-गोपीचन्दनोपनिषद्
६५-चतुर्वेदोपनिषद्
६६-चाक्षुषोपनिषद् (चक्षरुपनिषद्, चक्षुरोगोपनिषद्, नेत्रोपनिषद्)
६७-चित्त्युपनिषद्
६८-छागलेयोपनिषद्
६९-छान्दोग्योपनिषद् (सामवेद)
७०जाबालदर्शनोपनिषद् (सामवेद)
७१-जाबालोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
७२-जाबाल्युपनिषद् (सामवेद)
७३-तारसारोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
७४-तारोपनिषद्
७५-तुरीयातीतोपनिषद् (तीतावधूतो०) (शुक्लयजुर्वेदीय)
७६-तुरीयोपनिषद्
७७-तुलस्युपनिषद्
७८-तेजोबिन्दुपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
७९-तैत्तरीयोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
८०-त्रिपादविभूतिमहानारायणोपनिषद् (सामवेद)
८१-त्रिपुरातापिन्युपनिषद् (सामवेद)
८२-त्रिपुरोपनिषद् (ऋग्वेदीय)
८३-त्रिपुरामहोपनिषद्
८४-त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
८५-त्रिसुपर्णोपनिषद्
८६-दक्षिणामूर्त्युपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
८७-दत्तात्रेयोपनिषद् (सामवेद)
८८-दत्तोपनिषद्
८९-दुर्वासोपनिषद्
९०- (१) देव्युपनिषद् (पद्यात्मक एवं मन्त्रात्मक) (सामवेद) * (२) देव्युपनिषद् (शिवरहस्यान्तर्गत-अनुपलब्ध)
९१-द्वयोपनिषद्
९२-ध्यानबिन्दुपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
९३-नादबिन्दुपनिषद् (ऋग्वेदीय)
९४-नारदपरिब्राजकोपनिषद् (सामवेद)
९५-नारदोपनिषद्
९६-नारायणपूर्वतापिन्युपनिषद्
९७-नारायणोत्तरतापिन्युपनिषद्
९८-नारायणोपनिषद् (नारायणाथर्वशीर्ष) (कृष्णयजुर्वेदीय)
९९-निरालम्बोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
१००-निरुक्तोपनिषद्
१०१-निर्वाणोपनिषद् (ऋग्वेदीय)
१०२-नीलरुद्रोपनिषद्
१०३-नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषद्
१०४-नृसिंहषटचक्रोपनिषद्
१०५-नृसिंहोत्तरतापिन्युपनिषद् (सामवेद)
१०६-पञ्चब्रह्मोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१०७-परब्रह्मोपनिषद् (सामवेद)
१०८-परमहंसपरिब्राजकोपनिषद् (सामवेद)
१०९-परमहंसोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
११०-पारमात्मिकोपनिषद्
१११-पारायणोपनिषद्
११२-पाशुपतब्राह्मोपनिषद् (सामवेद)
११३-पिण्डोपनिषद्
११४-पीताम्बरोपनिषद्
११५-पुरुषसूक्तोपनिषद्
११६-पैङ्गलोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
११७-प्रणवोपनिषद् (पद्यात्मक)
११८-प्रणवोपनिषद् (वाक्यात्मक
११९-प्रश्नोपनिषद् (सामवेद)
१२०-प्राणाग्निहोत्रोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१२१-बटुकोपनिषद (बटुकोपनिषध)
१२२-ब्रह्वृचोपोपनिषद् (ऋग्वेदीय)
१२३-बाष्कलमन्त्रोपनिषद्
१२४-बिल्वोपनिषद् (पद्यात्मक)
१२५-बिल्वोपनिषद् (वाक्यात्मक)
१२६-बृहज्जाबालोपनिषद् (सामवेद)
१२७-बृहदारण्यकोपनिषद् (शुक्लयजर्वेदीय)
१२८-ब्रह्मविद्योपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१२९-ब्रह्मोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१३०-भगवद्गीतोपनिषद्
१३१-भवसंतरणोपनिषद्
१३२-भस्मजाबालोपनिषद् (सामवेद)
१३३-भावनोपनिषद् (कापिलोपनिषद्) (सामवेद)
१३४-भिक्षुकोपनिष (शुक्लयजुर्वेदीय)
१३५-मठाम्नयोपनिषद्
१३६-मण्डलब्राह्मणोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
१३७-मन्त्रिकोपनिषद् (चूलिकोपनिषद्) (शुक्लयजुर्वेदीय)
१३८-मल्लायुपनिषद्
१३९-महानारायणोपनिषद् (बृहन्नारायणोपनिषद्, उत्तरनारायणोपनिषद्)
१४०-महावाक्योपनिषद्
१४१-महोपनिषद् (सामवेद)
१४२-माण्डूक्योपनिषद् (सामवेद)
१४३-माण्डुक्योपनिषत्कारिका

  • (क)-आगम
  • (ख)-अलातशान्ति
  • (ग)-वैतथ्य
  • (घ)-अद्वैत

१४४-मुक्तिकोपनिषद् (शुक्लयजर्वेदीय)
१४५-मुण्डकोपनिषद् (सामवेद)
१४६-मुद्गलोपनिषद् (ऋग्वेदीय)
१४७-मृत्युलाङ्गूलोपनिषद्
१४८-मैत्रायण्युपनिषद् (सामवेद)
१४९-मैत्रेव्युपनिषद् (सामवेद)
१५०-यज्ञोपवीतोपनिषद्
१५१-याज्ञवल्क्योपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
१५२-योगकुण्डल्युपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१५३-योगचूडामण्युपनिषद् (सामवेद)
१५४-(१) योगतत्त्वोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१५५-(२) योगतत्त्वोपनिषद्
१५६-योगराजोपनिषद्
१५७-योगशिखोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१५८-योगोपनिषद्
१५९-राजश्यामलारहस्योपनिषद्
१६०-राधोकोपनिषद् (वाक्यात्मक)
१६१-राधोकोपनिषद् (प्रपठात्मक)
१६२-रामपूर्वतापिन्युपनिषद् (सामवेद)
१६३-रामरहस्योपनिषद् (सामवेद)
१६४-रामोत्तरतापिन्युपनिषद्
१६५-रुद्रहृदयोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१६६-रुद्राक्षजाबालोपनिषद् (सामवेद)
१६७-रुद्रोपनिषद्
१६८-लक्ष्म्युपनिषद्
१६९-लाङ्गूलोपनिषद्
१७०-लिङ्गोपनिषद्
१७१-बज्रपञ्जरोपनिषद्
१७२-बज्रसूचिकोपनिषद् (सामवेद)
१७३-बनदुर्गोपनिषद्
१७४-वराहोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१७५-वासुदेवोपनिषद् (सामवेद)
१७६-विश्रामोपनिषद्
१७७-विष्णुहृदयोपनिषद्
१७८-शरभोपनिषद् (सामवेद)
१७९-शाट्यायनीयोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
१८०-शाण्डिल्योपनिषद् (सामवेद)
१८१-शारीरकोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१८२-(१) शिवसङ्कल्पोपनिषद्
१८३-(२) शिवसङ्कल्पोपनिषद्
१८४-शिवोपनिषद्
१८५-शुकरहस्योपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१८६-शौनकोपनिषद्
१८७-श्यामोपनिषद्
१८८-श्रीकृष्णपुरुषोत्तमसिद्धान्तोपनिषद्
१८९-श्रीचक्रोपनिषद्
१९०-श्रीविद्यात्तारकोपनिषद्
१९१-श्रीसूक्तम
१९२-श्वेताश्वतरोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
१९३-षोढोपनिषद्
१९४-सङ्कर्षणोपनिषद्
१९५-सदानन्दोपनिषद्
१९६-संन्यासोपनिषद् (अध्यायात्मक) (सामवेद)
१९७-संन्यासोपनिषद् (वाक्यात्मक)
१९८-सरस्वतीरहस्योपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
२००-सर्वसारोपनिषद् (सर्वोप०) (कृष्णयजुर्वेदीय)
२०१-स ह वै उपनिषद्
२०२-संहितोपनिषद्
२०३-सामरहस्योपनिषद्
२०४-सावित्र्युपनिषद् (सामवेद)
२०५-सिद्धान्तविठ्ठलोपनिषद्
२०६-सिद्धान्तशिखोपनिषद्
२०७-सिद्धान्तसारोपनिषद्
२०८-सीतोपनिषद् (सामवेद)
२०९-सुदर्शनोपनिषद्
२१०-सुबालोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
२११-सुमुख्युपनिषद्
२१२-सूर्यतापिन्युपनिषद्
२१३-सूर्योपनिषद् (सामवेद)
२१४-सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद् (ऋग्वेदीय)
२१५-स्कन्दोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
२१६-स्वसंवेद्योपनिषद्
२१७-हयग्रीवोपनिषद् (सामवेद)
२१८-हंसषोढोपनिषद्
२१९-हंसोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
२२०-हेरम्बोपनिषद्

१०८ उपनिषद् एवं उनका वर्गीकरण

१०८ उपनिषदों को निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जाता है -

  • (१) ऋग्वेदीय -- १० उपनिषद्
  • (२) शुक्ल यजुर्वेदीय -- १९ उपनिषद्
  • (३) कृष्ण यजुर्वेदीय -- ३२ उपनिषद्
  • (४) सामवेदीय -- १६ उपनिषद्
  • (५) अथर्ववेदीय -- ३१ उपनिषद्

कुल -- १०८ उपनिषद्

मुख्य उपनिषद्

प्रतिपाद्य विषय तथा महत्ता की दृष्टि से

विषय की गम्भीरता तथा विवेचन की विशदता के कारण १३ उपनिषद् विशेष मान्य तथा प्राचीन माने जाते हैं।
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने १० पर अपना भाष्य दिया है-

(१) ईश, (२) ऐतरेय (३) कठ (४) केन (५) छांदोग्य (६) प्रश्न (७) तैत्तिरीय (८) बृहदारण्यक (९) मांडूक्य और (१०) मुंडक।

उन्होने निम्न तीन को प्रमाण कोटि में रखा है-

(१) श्वेताश्वतर (२) कौषीतकि तथा (३) मैत्रायणी।

अन्य उपनिषद् तत्तद् देवता विषयक होने के कारण 'तांत्रिक' माने जाते हैं। ऐसे उपनिषदों में शैव, शाक्त, वैष्णव तथा योग विषयक उपनिषदों की प्रधान गणना है।

वेदों के अनुसार 13 उपनिषदों को निम्नलिखित रूपों में विभाजित किया जाता है -

वेद

सम्बन्धित उपनिषद

1- ऋग्वेद

ऐतरेयोपनिषद

2- यजुर्वेद

बृहदारण्यकोपनिषद

3- शुक्ल यजुर्वेद

ईशावास्योपनिषद

4- कृष्ण यजुर्वेद

तैत्तिरीयोपनिषद, कठोपनिषद, श्वेताश्वतरोपनिषद, मैत्रायणी उपनिषद

5- सामवेद

वाष्कल उपनिषद, छान्दोग्य उपनिषद, केनोपनिषद

6- अथर्ववेद

माण्डूक्योपनिषद, प्रश्नोपनिषद, मुण्डकोपनिषद

लेखन विधा की दृष्टि से

विचारकों (डॉ॰ डासन, डॉ॰ बेल्वेकर तथा रानडे) ने उपनिषदों का विभाजन लेखन विधा की दृष्टि से इस प्रकार किया है :

१. गद्यात्मक उपनिषद्

१. ऐतरेय, २. केन, ३. छांदोग्य, ४. तैत्तिरीय, ५. बृहदारण्यक तथा ६. कौषीतकि;
इनका गद्य ब्राह्मणों के गद्य के समान सरल, लघुकाय तथा प्राचीन है।

२.पद्यात्मक उपनिषद्

१.ईश, २.कठ, ३. श्वेताश्वतर तथा नारायण
इनका पद्य वैदिक मंत्रों के अनुरूप सरल, प्राचीन तथा सुबोध है।

३. अवांतर गद्योपनिषद्

१.प्रश्न, २.मैत्री (मैत्रायणी) तथा ३.मांडूक्य ४ .आथर्वण (अर्थात् कर्मकाण्डी) उपनिषद्
अन्य अवांतरकालीन उपनिषदों की गणना इस श्रेणी में की जाती है।

भाषा तथा उपनिषदों के विकास क्रम के आधार पर

भाषा तथा उपनिषदों के विकास क्रम की दृष्टि से डॉ॰ डासन ने उनका विभाजन चार स्तर में किया है :

प्राचीनतम
१. ईश, २. ऐतरेय, ३. छांदोग्य, ४. प्रश्न, ५. तैत्तिरीय, ६. बृहदारण्यक, ७. मांडूक्य और ८. मुंडक

प्राचीन
१. कठ, २. केन

अवांतरकालीन

(१) कौषीतकि, २. मैत्री (मैत्राणयी) तथा ३. श्वेताश्वतर

नवीन

अन्य सभी

वेदांग 

वेदांग वेदों के अध्ययन में सहायक विषयों और उनसे संबंधित ग्रंथों को कहा जाता है
परंपरागत रुप से शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, छन्द और निरूक्त - ये छ: वेदांग है।

शिक्षा - इसमें वेद मन्त्रों के उच्चारण करने की विधि बताई गई है ।

कल्प - वेदों के किस मन्त्र का प्रयोग किस कर्म में करना चाहिये, इसका कथन किया गया है। इसकी तीन शाखायें हैं -  श्रौतसूत्रगृह्यसूत्र और धर्मसूत्र।

व्याकरण - इससे प्रकृति और प्रत्यय आदि के योग से शब्दों की सिद्धि और उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित स्वरों की स्थिति का बोध होता है।

निरुक्त - वेदों में जिन शब्दों का प्रयोग जिन -जिन अर्थों में किया गया है , उनके उन -उन अर्थों का निश्चयात्मक रूप से उल्लेख निरूक्त में किया गया है।

ज्योतिष - इससे वैदिक यज्ञों और अनुष्ठानों का समय ज्ञात होता है। यहाँ ज्योतिष से मतलब `वेदांग ज्योतिष´ से है।

छन्द - वेदों में प्रयुक्त छन्दों की रचना का ज्ञान छन्दशास्त्र से होता है।

वेदों के उपवेद-

परंपरा अनुसार वेदों से निकली हुयी शाखाओं रूपी वेद ज्ञान को उपवेद कहते हैं। ये मूलतः ज्ञान और कौशल की वे तत्कालीन विधाएँ हैं, जो उस समय आवश्यक या लोकप्रिय थीं । संस्कृति उन्हें वेद प्रसूत ही मानती है । ये चार वेद (ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद) अनुसार अलग-अलग हैं-

ऋग्वेद का धनुर्वेद
सामवेद का गंधर्ववेद
अथर्ववेद का आयुर्वेद
यजुर्वेद का शिल्पवेद या स्थापत्यवेद

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