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देवस्‍थान विभाग मन्दिर संस्‍कृति के संरक्षण एवं संवर्द्धन का विभाग है। इस विभाग के वर्तमान स्‍वरूप का भूतपूर्व राजपुताना राज्‍य छोटी-बडी 22 रियासतों के विलीनीकरण के पश्‍चात पूर्व देशी राज्‍यों द्वारा राज्‍यकोष के माघ्‍यम से संचालित मन्दिरों, मठों, धर्मशालाओं आदि के प्रबंधन एवं सुचारू संचालन हेतु वर्ष 1949 में बने वृहत् राजस्‍थान राज्‍य के साथ-साथ हुआ, किन्‍तु परिवर्तित परिस्थितियों के अनुसार समय-समय पर राज्‍य सरकार द्वारा विभागीय कार्यकलापों का विस्‍तार किया गया है तथा नवीन दायित्‍व सौंपे गये है। विगत वर्षों में देवस्‍थान विभाग की पहचान मात्र मन्दिरों की सेवा-पूजा और उनकी सम्‍पत्ति के प्रबंधकर्ता विभाग की रही है। अत: संस्‍कृति और आस्‍थाओं के प्रबंध को गतिशील बनाने हेतु शासन की नवीन नीति में देवस्‍थान विभाग को पर्यटन, कला और संस्‍कृति के साथ जोडा गया है तथा तीर्थाटन एवं देशाटन को बढाया देने हेतु पर्यटन, कला एवं संस्‍कृति विभाग् के समन्‍वय से प्रयास किए जा रहे है।


देवस्‍थान विभाग द्वारा पूर्व दिशा रियासतों के विलीनीकरण के पश्‍चात् वर्तमान राज्‍य शासन को उत्‍तरदायित्‍व में प्रबंध एवं संचालन तथा अनुरक्षण हेतु प्राप्‍त 390 राजकीय प्रत्‍यक्ष प्रभार एवं 204 राजकीय आत्‍म निर्भर श्रेणी के मन्दिरों एवं संस्‍थाओं का सीधा प्रबंधन किया जाता है। राज्‍य सरकार द्वारा वर्ष 2010-11 में विभागीय मन्दिरों एवं संस्‍थाओं के अनुरक्षण एवं जीर्णोद्धार हेतु आयोजना मद में 500.00 लाख रूपये, गैर आयोजना मद में 10.00 लाख रूपये एवं संयुक्‍त निधि मद में 200.00 लाख रूपये की लागत के कुल 86 कार्य स्‍वीकृत किये गये है। यह भी उल्‍लेखनीय है कि माह दिसम्‍बर, 2010 तक संग्रहित राशि विभागीय राजस्‍व प्रगति का परिचाय‍क है।

राजस्‍थान राज्‍य का गौरवशाली अतीत पूर्व शासकों की धार्मिक निष्‍ठा एवं धर्म पालन हेतु किये गये बलिदानों के लिए विख्‍यात है। देशी राज्‍यों के शासकों ने रियासत का राजा स्‍वंय को नहीं मानकर अपने इष्‍ट देवता के नाम की मोहरें एवं राजपत्र में अंकित मुद्राओं से राज्‍य का शासन किया। वर्तमान देवस्‍थान विभाग विरासत में प्राप्‍त ऐसी ही धार्मिक एवं पुण्‍य प्रयोजनार्थ स्‍थापित संस्‍थाओं एवं राजकीय मन्दिरों, मठों, लोक प्रन्‍यासों का नियमन करने, उनके प्रशासन हेतु मार्गदर्शन देने, उन्‍हें आर्थिक सहयोग देने जैसे धार्मिक एवं सामाजिक कर्तव्‍यों का निर्वहन करता है। कालान्‍तर में बदली हुई परिस्थितियों के अनुरूप राजस्‍थान सार्वजनिक प्रन्‍यास अधिनियम, 1959 के अन्‍तर्गत न्‍यासों का पंजीकरण, शिकायतों की जांच, भूमि सुधार कार्यक्रमों के फलस्‍वरूप मन्दिरों / मठों की भूमियों के पुन: ग्रहण के पश्‍चात निर्धारित वार्षिकी के भुगतान तथा मन्दिरों / संस्‍थाओं का सहायता अनुदान स्‍वीकृत करने के कार्यकलाप भी इस विभाग के कार्यक्षेत्र में विस्‍तारित हुए है।

राजस्‍थान राज्‍य में एवं राज्‍य के बाहर विभिन्‍न तीर्थ स्‍थलों पर बने राज्‍य के मन्दिर एवं पूजा स्‍थल मध्‍यकाल से ही धार्मिक, नैतिक, सामाजिक, आध्‍यात्मिक तथा शैक्षणिक प्रवृत्तियों के केन्‍द्र रहे है। इनके माध्‍यम से ज्‍योतिष, आयुर्वेद, कर्मकाण्‍ड, धर्मशास्‍त्र, संगीत, शिल्‍प, चित्रकला, मूर्तिकला, लोकगीत, भजन, नृत्‍य परम्‍परा आदि का संरक्षण, प्रसार एवं प्रशिक्षण होता रहा है। इस प्रक्रिया में अनेक धर्मज्ञ विद्वानों, निराश्रितों, विद्यार्थियों, साधु-संतों को सहयोग, प्रोत्‍साहन एवं संरक्षण भी मिलता रहा है। समय के अनुरूप सामाजिक परिवर्तनों के उपरान्‍त भी ये मन्दिर एवं पूजा स्‍थल आज भी धार्मिक सौहार्द व सामाजिक आवश्‍यकताओं की पूर्ति में महत्‍वपूर्ण भूमि‍का निभा रहे है। प्राचीन स्‍थापत्‍य कला, शिल्‍पकला व चित्रशालाओं के ये अनूठे भण्‍डार अर्वाचीन भारत की अमूल्‍य निधि है। नवीन राजस्‍थान राज्‍य के निर्माण के पश्‍चात इस विपुल मन्दिर संपदा के प्रबंध व संरक्षण का उत्‍तरदायित्‍व वर्तमान देवस्‍थान विभाग के पास है।

Nodal Officer:

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Last Updated : 24.04.2017